Kalank Ka Devta (Hindi Edition)

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ये पुस्तक लिखते वक़्त मुझे ऐसा ही लग रहा था मानो मैं किसी अपनी ही उलझन को शब्द दे रहा हूँ। हम सभी अपनी ज़िंदगी में कभी न कभी ये जरूर सोचते हैं कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं और फिर हम खुद को भी उन लोगों में से एक लोग बना देते हैं और अपनी सोच तक पर खुद से फुर्सत में विमर्श करते हैं। पाप और पुण्य, भला और बुरा, यश और अपयश और न जाने ऐसे कितने द्वंद चलते रहते हैं हमारे दिमाग में। इस उपन्यास के अंत तक मैं खुद ये कहने का साहस नहीं करता हूँ कि प्रभात को क्या माना जाये, एक देवता या एक कलंक… आप बताइये कि आपकी बात मैं उस तक पहुंचा सकूँ…उसे खुद को जवाब देना है!


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(as of Aug 12,2022 09:27:39 UTC – Details)




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